सफलता शब्दों का खेल है By Dr. Sudhir Dixit Book Summary in Hindi

सफलता शब्दों का खेल है | Safalta Shabdon Ka Khel Hai By Dr. Sudhir Dixit Book Summary in Hindi

सफलता शब्दों का खेल है By Dr. Sudhir Dixit Book Summary in Hindi
सफलता शब्दों का खेल है By Dr. Sudhir Dixit Book Summary in Hindi

          💕Hello Friends,आपका स्वागत है learningforlife.cc में। यह पोस्ट आपको बताएगा कि आप दूसरों की बातें सुनकर उनका सही अर्थ कैसे समझें। यह पोस्ट आपको बताएगा कि आप अपनी बात कैसे कहें, ताकि लोग उनका सही अर्थ समझ जाएँ। यह पोस्ट आपको शब्दों का विशेषज्ञ बनाए न बनाए, उनका कुशल खिलाड़ी जरूर बना देगी। शोध से यह साबित हो चुका है कि जिन लोगों की Communication Skills ज्यादा बहतर होती है, वे जीवन में ज्यादा तरक्की करते हैं। तो इस पोस्ट को लास्ट तक पढ़े जिससे आप शब्दों के खेल में माहिर हो जाये।

अर्थ के अनर्थ का मूल कारणः शब्द प्रतीक होते हैं

         अगर वक्ता बिलकुल स्पष्ट न हो, तो गलत मतलब निकलने की आशंका बढ़ जाती है।ऐसे शब्द बोलें, जिनका अर्थ स्पष्ट हो, वरना सामने वाला आपकी बात गलत समझ लेगा और आप मुश्किल में पड़ जाएँगे।
For Example : भगवान एक आदमी से दो वरदान माँगने को कहते हैं। खुश होकर वह आदमी सबसे अच्छी शराब और सबसे अच्छी औरत माँग लेता है। अगले ही पल उसे सबसे अच्छी शराब मिल जाती है और साथ में …. मदर टेरेसा भी।

भाषा के 8 बुनियादी सिद्धांत 

1. ईश्वर ने हमें दो कान और एक मुँह दिया है

ईश्वर ने आपको दो कान इसलिए नहीं दिए हैं, ताकि आप एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल दें। उसने दो कानों के बीच एक दिमाग भी दिया है, ताकि शब्द किधर से भी आएँ, सीधे आपके दिमाग में जाएँ। ईश्वर के इरादे को समझें: मुँह कम खोलें, कान ज्यादा खोलें और दिमाग तो हमेशा खुला रखें। भाषा की दुविधा दूर करने का इससे अच्छा कोई उपाय नहीं है।

2. सुनना बोलने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है

किसी विद्वान के शब्द याद रखें, जब आपका मुँह खुला रहता है, तो आप कुछ नहीं सीखते हैं। आप तो तब सीखते हैं, जब आपके कान खुले रहते हैं और दिमाग भी।

3. बॉडी लैंग्वेज की सीमाएँ होती हैं

बॉडी लैंग्वेज का ज्ञान उपयोगी तो है, लेकिन यह न भूलें कि बॉडी लैंग्वेज की भी सीमाएँ होती हैं।यह याद रखने में समझदारी है कि बॉडी लैंग्वेज हमेशा कारगर नहीं होती और वैचारिक चर्चा में शब्द ही प्रमुख अस्त्र होते हैं।

4. इरादा सबसे महत्वपूर्ण होता है

शब्दों का उतना महत्व नहीं होता, जितना कि इरादे का। अगर कोई आपको ‘पगला’ कहता है, तो महत्व शब्द का नहीं, उसके इरादे का है। यह विचार करें कि क्या वह आपको नीचा दिखाने या अपमानित करने के लिए ऐसा कर रहा है? या फिर मजाक में कह रहा है? संवाद के लक्ष्य को कभी न भूलें।

5. गलत भाषा गलतफहमियों की जड़ होती है

भाषा ही वह चीज है, जो इंसान को पशुओं से अलग करती है। लेकिन लोग भाषा का जितना दुरुपयोग करते हैं, उतना शायद समय के अलावा किसी दूसरी चीज का नहीं करते। अक्सर गलत भाषा के कारण गलतफहमियाँ हो जाती हैं, कई बार तो लड़ाई-झगड़े की नौबत तक आ जाती है।जाहिर है, इसमें गलतफहमियों की गुंजाइश हमेशा रहती है और इस बारे में जागरूक रहने पर आप बहुत सी समस्याओं से बच सकते हैं।

6. सिर्फ गौर से सुनना ही काफी नहीं है

बहुतसी Books हमें बताती हैं कि किसी दूसरे की बात समझने के लिए हमें पूरे गौर से सुनना चाहिए। लेकिन सिर्फ सुनना ही काफी नहीं है। हमारे पास ऐसे साधन होने चाहिए, ताकि हम सुनी हुई बातों की व्याख्या करके असल अर्थ तक पहुँच जाएँ।

7. शब्दों की व्याख्या महत्वपूर्ण होती है

हम दिन भर में हजारों शब्द बोलते हैं और दसियों लोगों से बातचीत करते हैं। वे हमसे कुछ कहने की कोशिश कर रहे हैं, हम उनसे कुछ कहने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उनकी बात समझ पा रहे हैं और क्या वे हमारी बात समझ पा रहे हैं। शायद नहीं। कारण सिर्फ यह है कि हम उनके या वे हमारे शब्दों की सही व्याख्या करने की जहमत नहीं उठा रहे हैं।

8. हर एक की प्रोसेसिंग स्पीड अलग-अलग होती है

अगर कोई बहुत तेजी से बोलता है, तो आम तौर पर उसकी प्रोसेसिंग स्पीड तेज होती है। ऐसे में आपको भी तेजी से बोलने की कोशिश करनी चाहिए, वरना सामने वाला आपके धीमेपन पर झुँझलाने लगेगा। अगर सामने वाले की गति धीमी है, तो आपको भी अपनी गति धीमी कर लेनी चाहिए, वरना सामने वाला आपकी बात समझ ही नहीं पाएगा।

संवाद प्रक्रिया के 6 पायदान

इन छह पायदानों में से शुरुआती तीन पायदान बोलने वाले से संबंधित हैं, जबकि आखिरी तीन पायदान सुनने वाले से। आइए, इन सभी के बारे में detail में जानते हैं:

1. विचार/भाव

यह वह उद्देश्य है, जिसकी वजह से हम कुछ कहते हैं। हम इसलिए बोलते हैं, क्योंकि हमें कोई विचार या भाव व्यक्त करना होता है। हमारे बोले गए शब्द मूलतः दो प्रकार हैं: क्रिया और प्रतिक्रिया। क्रिया में आप बातचीत का सिलसिला शुरू करते हैं, जबकि प्रतिक्रिया में आप सामने वाले की बात का जवाब देते हैं।

2. कोडिंग/मंतव्य

इसमें आप अपने विचार या भाव के लिए उचित शब्द खोजते हैं।अपने विचार या भाव को सही शब्दों में बदलने की प्रक्रिया ही कोडिंग कहलाती है। कोडिंग करते समय हमेशा ध्यान रखें कि आपका उद्देश्य सामने वाले को अपनी बात पूरी तरह समझाना है, इसलिए वही शब्द चुनें, जो उसकी समझ में आ जाएँ।

3. अभिव्यक्ति/शब्द बोलना

अभिव्यक्ति बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सिर्फ शब्द ही काफी नहीं होते। उन्हें बोलने का अंदाज भी महत्वपूर्ण होता है। यहीं पर बॉडी लैंग्वेज का खेल शुरू होता है। हम कौन से शब्द बोलते हैं, यह तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि हम उन्हें कैसे बोलते हैं। हमारे भाव कैसी है? हमारा लहजा कैसा है? हमारी आवाज का स्तर कैसा है? हम जोर से बोल रहे हैं या धीरे-धीरे? हमारी शैली कैसी है?

For Example : हमने सुबह किसी मोटे सेठ को केले के छिलके पर फिसलते देखा, जिससे उसके सफेद धोती-कुर्ते पर कीचड़ लग गया और वह चारों खाने चित्त हो गया। अगर किसी दोस्त को यह प्रसंग बताते समय हम सामान्य अंदाज में कहते हैं, ‘सुबह मैंने एक सेठ को गिरते देखा,’ तो यह वाक्य सुनने के बाद उसका चेहरा गंभीर ही रहेगा। आप उसके हँसने की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन वह गंभीर रहा। कारण? हमारी अभिव्यक्ति की गड़बड़ी। आपने उसे यह संकेत ही नहीं दिया कि यह बात मजेदार है। आपने अपनी बात की चटपटी कोडिंग नहीं की। आपने उसे मसालेदार नहीं बनाया। आपने सिर्फ सामान्य अंदाज में बात बताई, इसलिए आपको सामान्य प्रतिक्रिया ही मिली। जाहिर है, कोडिंग में शब्दों के अलावा चेहरे के हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से भी मदद मिलती है।

4. शब्द सुनना/श्रवण

हमारी सुनने की गति सामने वाले के बोलने की गति के मुकाबले काफी ज्यादा होती है, इसलिए लोगों की बातें सुनते समय हमारा दिमाग आसानी से भटक सकता है, और अक्सर भटकता भी है। सफल श्रोता सक्रियता से सुनते हैं। वे पूरा ध्यान केंद्रित करते हैं, नजरों से नजरें मिलाते हैं, उपयुक्त समय पर सिर हिलाते हैं, बीच-बीच में हूँ-हाँ करते हैं, सवाल पूछते हैं, पूरी बात अच्छी तरह समझना चाहते हैं और आपको बोलने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

5. डिकोडिंग/व्याख्या

बोलने से पहले हम कोडिंग करते हैं और सुनने के बाद डिकोडिंग। कारण वही है: शब्द प्रतीक होते हैं। डिकोडिंग की प्रक्रिया में आप सामने वाले की बात का अर्थ निकालते हैं। आप अपने शब्द-भंडार में हाथ डालकर उसके शब्दों का मतलब खोजने की कोशिश करते हैं। यहाँ पर गड़बड़ी की काफी गुंजाइश रहती है। याद रहे, जब भी किसी शब्द के दो अर्थ संभव होते हैं, तो हम अपने फिल्टर के हिसाब से मनचाहा अर्थ निकाल लेते हैं, जिससे खास तौर पर भावनात्मक क्षेत्र में काफी दिक्कत खड़ी हो जाती है।

डिकोडिंग में हमारे पुराने अनुभवों और सामने वाले व्यक्ति के पुराने रिकॉर्ड से भी फर्क पड़ता है। अगर सामने वाले की छवि यह है कि वह ज्यादातर झूठ बोलता है, तो डिकोडिंग करते वक्त हम यह बात ध्यान रखेंगे और उसकी बात पर यकीन नहीं करेंगे। दूसरी तरफ, अगर हमें लगता है कि सामने वाला वादे का पक्का है और बिलकुल सच्चा है, तो हम उसकी बात को ज्यादा महत्व देंगे। निष्कर्ष यह है कि सामने वाले की छवि डिकोडिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए अपनी छवि अच्छी बनाना न भूलें।

6. विचार/भाव समझना और प्रतिक्रिया करना

डिकोडिंग करके हम अपने हिसाब से मतलब निकाल लेते हैं, लेकिन हम अक्सर यह पुष्टि करने की कोशिश ही नहीं करते कि हमने जो मतलब निकाला है, वह कितना सही है। हम अक्सर बगैर सही या पूरा मतलब समझे अपने दृष्टिकोण से बात आगे बढा देते हैं। हम जो भी अर्थ समझते हैं, उसी के हिसाब से अपनी प्रतिक्रिया तय करते हैं। अगर हमने गलत अर्थ निकाला है, तो हमारी प्रतिक्रिया भी गलत होगी।

संवाद कौशल के 8 सूत्र

संवाद कौशल का पहला सूत्रः प्रसंग या संदर्भ

अगर परिस्थिति सही नहीं है, तो बेहतर से बेहतर भाषा का भी परिणाम शून्य होगा। मान लें किसी के घर में आग लगी हुई है और ऐसे में आप उससे राजनीति या धर्म संबंधी बेहतरीन बात कहें, तो क्या होगा? कुछ भी नहीं होगा। वह आपकी बात पर ध्यान ही नहीं देगा।अगर प्रसंग सही नहीं है, तो भाषा निष्फल है। यह रेगिस्तान में गन्ना लगाने जैसी बात है। प्रसंग या संदर्भ सही होने पर ही बाकी सारी चीजों का महत्व होता है।

संवाद कौशल का दूसरा सूत्रः किसने कहा?

मान लें, कोई आपसे कहता है, ‘आपकी मौत तय है।’ महत्वपूर्ण बात यह है कि कहने वाला व्यक्ति कौन है। अगर वह डॉक्टर है, तो उसकी बात में दम है। अगर वह ज्योतिषी है, तो उसकी बात सोचने लायक है। लेकिन अगर कोई सीधा-सादा व्यक्ति चिढ़कर आपसे यह बात कह रहा है, तो उसकी बात पर ज्यादा गौर नहीं करना चाहिए। कहने वाला कौन है, इससे ही बात का महत्व तय होता है। बात वही रहती है, लेकिन कहने वाले के हिसाब से उसका महत्व अलग हो जाता है।

संवाद कौशल का तीसरा सूत्रः किससे कहा?

संवाद करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति सबसे महत्वपूर्ण है, इसलिए हमें अपनी बात की कोडिंग उसके हिसाब से करनी चाहिए, ताकि वह हमारी पूरी बात समझ जाए। अगर कोई तीन साल का बच्चा आपसे ईश्वर के बारे में पूछता है, तो आप शायद उसे सरल भाषा में छोटा सा उत्तर देंगे । लेकिन तीस साल के व्यक्ति को आप ज्यादा बड़ा उत्तर देंगे। आपकी शब्दावली श्रोता के अनुरूप होनी चाहिए।
मान लें, आप कपड़े बेच रहे हैं। आप अपने रंगीन कपड़ों की जोरदार तारीफ करते हैं और सामने वाले को कुछ कहने का मौका ही नहीं देते। दो घंटे खपाने और दसियों कपड़े दिखाने के बाद आपको पता चलता है कि सामने वाला सिर्फ सफेद कपड़े ही पहनता है। क्या आपको नहीं लगता कि आपको उसकी जरूरत पहले ही पता कर लेनी चाहिए थी?

संवाद कौशल का चौथा सूत्रः कब कहा?

टाइमिंग सटीक होना जरूरी है, तभी प्रभावी हुआ जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति परेशान है या दाँत के दर्द से छटपटा रहा है और ऐसे में कोई उससे पिकनिक पर चलने का प्रस्ताव रखता है, तो वह उसे ठुकरा देगा। लेकिन अगर आप उसी व्यक्ति से एक हफ्ते बाद वही प्रस्ताव रखते हैं, तो हो सकता है वह स्वीकार कर ले। ऐसा क्यों? क्योंकि समय बदल गया है, परिस्थितियाँ बदल गई हैं।

संवाद कौशल का पाँचवाँ सूत्रः कहाँ कहा?

इस बात से बहुत फर्क पड़ता है कि आप अपनी बात कहाँ कहते हैं। जगह सही होनी चाहिए। अगर आप किसी से कोई गोपनीय बात कहने वाले हैं, तो अच्छी तरह सोच लें कि आप यह बात कहाँ कहेंगे? अगर बात महत्वपूर्ण है, तो जगह पर खास ध्यान देना चाहिए। आप किसी की प्रशंसा मंच पर खड़े होकर करते हैं या अकेले में, इसका अलग-अलग असर होता है। दूसरों के सामने की गई सार्वजनिक प्रशंसा का असर ज्यादा होता है और लोग जितने ज्यादा हों, असर उतना ही ज्यादा होता है।

संवाद कौशल का छठा सूत्रः क्यों कहा?

क्यों कहा? यानी कहने वाले का इरादा क्या है? उसने यह बात क्यों कही? वह क्या चाहता है? यह बात कहने के पीछे उसका उद्देश्य क्या है?मान लें, कोई आपसे कहता है, ‘मैं हर रोज सुबह कसरत करता हूँ।’ यह कहने के पीछे उसका क्या उद्देश्य है? शायद वह आपको यह बताना चाहता है कि वह अपनी सेहत के बारे में जागरूक है। या फिर यह संकेत देना चाहता है कि आपको कसरत करने की जरूरत है। या शायद उसने अभी-अभी कसरत करना शुरू किया है और उत्साह में आपको यह बात बता रहा है। संभावनाएँ बहुत सारी हैं। आपको परिस्थिति का विश्लेषण करने के बाद ही उचित प्रतिक्रिया तय करनी चाहिए।

संवाद कौशल का सातवाँ सूत्रः क्या कहा?

अक्सर हम सरसरी तौर पर कोई बात सुनकर या कोई चीज पढ़कर गलत मतलब निकाल लेते हैं। इसलिए हमें अपनी बात ऐसे शब्दों में कहनी चाहिए, ताकि उसका गलत मतलब निकाला ही न जा सके। अगर हम दुकान में घुसकर कहते हैं, ‘कोई अच्छी ब्लेड दिखाओ।’ तो दुकानदार आम तौर पर वही ब्लेड दिखाएगा, जिसमें उसका प्रॉफिट मार्जिन सबसे ज्यादा होगा। इसके बजाय आपको स्पष्टता से कहना चाहिए, ‘जिलेट की माक थ्री टर्बो देना।’

संवाद कौशल का आठवाँ सूत्रः कैसे कहा?

कैसे कहा? का मतलब है कि उसने यह बात गुस्से में कही है या गंभीरता से कही है, ऊँची आवाज में कही है या सामान्य आवाज में। कैसे कहा में बॉडी लैंग्वेज की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कई बार हम बच्चों को प्यार से ‘पागल’ कह देते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि हम उन्हें सचमुच पागल समझ रहे हैं। यह तो सिर्फ लाड़ है। अगर कोई प्रेमिका प्रेमी के महँगा तोहफा देने पर उसे ‘पागल’ कह रही है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह नाराज है। वह तो सिर्फ प्यार का इजहार कर रही है।

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